266 वर्षों से आचार्यश्री भिक्षु की बनाई मर्यादाओं व नियमों पर चल रहा है यह शासन- आचार्य श्री महाश्रमण, आचार्य श्री महाश्रमण के 17वें पट्टोत्सव में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, वर्ष 2028 का चातुर्मास हरियाणा-कुरुक्षेत्र गोशाला में फरमाया

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266 वर्षों से आचार्यश्री भिक्षु की बनाई मर्यादाओं व नियमों पर चल रहा है यह शासन- आचार्य श्री महाश्रमण,

आचार्य श्री महाश्रमण के 17वें पट्टोत्सव में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, वर्ष 2028 का चातुर्मास हरियाणा-कुरुक्षेत्र गोशाला में फरमाया 

लाडनूं (kalamkala.in)। तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं में वैशाख शुक्ला दशमी को तेरापंथ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण के पट्टोत्सव की तिथि है। एक दिवस पूर्व वैशाख शुक्ल नवमी को आचार्य श्री महाश्रमण का जन्मदिन भी था। रविवार को चतुर्विध धर्मसंघ अपने वर्तमान अधिशास्ता के 17वें पदाभिषेक (पट्टोत्सव) मनाया गया। इस अवसर पर जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय), जैन विश्व भारती, महाप्रज्ञ प्रोग्रेसिव स्कूल, आचार्यश्री महाश्रमण योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति आदि संस्थाओं द्वारा आचार्यश्री महाश्रमण की अभिवंदना में बैनर, होर्डिंग्स लगाए गए और पूरे परिसर में स्थान-स्थान पर रंगोलियों को बनाया जाकर सजाया गया।उमड़ते श्रद्धालुओं की अपार भीड़ के कारण जैन विश्व भारती परिसर किसी मेला स्थल के रूप में परिवर्तित दिखाई दे रहा था। अपने पट्टोत्सव के इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण ने वर्ष 2028 का चतुर्मास हरियाणा राज्य के हिसार में करने की घोषणा की।

पाटोत्सव पर आचार्य श्री महाश्रमण का पावन प्रतिबोध

तेरापंथ के अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने सम्पूर्ण धर्मसंघ को प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि परमात्मा, परम वंदनीय भगवान महावीर का आज कैवल्य कल्याणक दिवस है। भगवान महावीर जो वर्धमान नाम से भी जाने जाते हैं। उन्होंने युवावस्था में साधुत्व स्वीकार किया। साढे बारह वर्षों तक साधना करते-करते आज के दिन उन्होंने केवल ज्ञान को प्राप्त कर लिया। दुनिया में परम विशिष्ट पुरुष आते हैं, जो दुनिया में राह दिखाने के लिए आते हैं, कइयों में चाह पैदा हो जाता है तो कई में उत्साह का जागरण भी हो जाता है। राह दिख जाना, चाह पैदा हो जाना और उत्साह का जाग जाना- ये तीनों चीजें प्राप्त हो जाती हैं तो आदमी पुरुषार्थ कर कोई उपलब्धि भी प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि आज का दिन किसी रूप में मुझसे भी जुड़ गया है। किसी रूप में मैं भी भगवान महावीर के इस दिन से जुड़ गया हूं। योग ऐसा बना है कि वैशाख शुक्लपक्ष से मेरे कई प्रसंग जुड़े हुए हैं तो भगवान महावीर का भी यह दिन वैशाख महीने के शुक्लपक्ष से जुड़ा हुआ है। दुनिया में अनेक धर्म हैं। हम सभी जैन धर्म में साधना कर रहे हैं। जैन धर्म में दिगम्बर और श्वेताम्बर रूप की दो धाराएं बह रही हैं। हम लोग श्वेताम्बर धारा के अमूर्तिपूजक धारा के तेरापंथ के पथिक हैं। इस संप्रदाय के प्रथम अनुशास्ता, जनक आचार्यश्री भिक्षु हुए। करीब 266 वर्ष पूर्व इसका प्रारम्भ हुआ। आचार्यश्री भिक्षु स्वामी द्वारा बनाई गई मर्यादाओं व नियमों के आधार पर यह शासन चल रहा है। मुझे दीक्षा लेने के बाद आचार्यश्री तुलसी के पास बचपन से ही रहने का अवसर मिला। उन्होंने मुझे कितना आगे बढ़ाया। युवाचार्यश्री महाप्रज्ञ के पास भी रहा। संघीय कार्य से भी जुड़ने का सुअवसर मिला। आचार्यश्री तुलसी के महाप्रयाण के बाद आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने मुझे युवाचार्य घोषित कर दिया और मुझे लगभग तेरह वर्षों तक उनकी साया में रहने का अवसर मिला। कितनी वत्सलता प्राप्त हुई। मुझे वर्षों तक उनके पास बैठकर आहार करने का मौका मिलता। उनके पास विद्यार्थी के रूप में कृपा मिला। इस प्रकार मुझे गुरुदेवश्री तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञ की कृपा प्राप्त हुई। आचार्यश्री महाप्रज्ञ के सरदारशहर में महाप्रयाण के बाद धर्मसंघ ने मुझे आज के दिन दायित्व की चद्दर ओढाई थी। सोलह-सतरह वर्षों में इतना बड़ा साधु-साध्वी तो आज तक उपस्थित नहीं हुआ था। एक दृष्टि से देखूं तो पट्टोत्सव तो मानों आज ही हो रहा है। यह पहली बार अभूतपूर्व दिन आया है, जब इतनी संख्या में साधु-साध्वियां व समणियां आदि उपस्थित हैं।

आचार्य महाश्रमण ने हरियाणा के हिसार में वर्ष 2028 के चातुर्मास की घोषणा की

आचार्यश्री महाश्रमण की सन्निधि में रविवार को हरियाणा से बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित हुए। हरियाणा के हिसार की विधायक, जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय की पूर्व कुलाधिपति एवं प्रसिद्ध उद्योगपति श्रीमती सावित्री जिन्दल भी उपस्थित रही उन्होंने आचार्यश्री महाश्रमण की अभिवंदना में अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि आपका सम्पूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, संयम और मानवता के उत्थान का दिव्य उदाहरण है। समाज को आप जैसे महापुरुष ही मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने आचार्यश्री से हिसार में चातुर्मास करने की पुरजोर प्रार्थना भी की। आचार्यश्री महाश्रमण ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए तथा उनकी प्रार्थना पर कृपा करते हुए कहा कि परम वंदनीय भगवान महावीर को सभक्ति को वंदना परम पूज्य आचार्यश्री भिक्षु व आचार्यश्री तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञजी को श्रद्धा के साथ नमन। द्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव की अनुकूलता की स्थिति में सन् 2028 का चातुर्मास हिसार में करने का भाव है। यथासंभवतया हरियाणा-कुरुक्षेत्र गोशाला में चतुर्मास करने का भाव है। आचार्यश्री की इस घोषणा से पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष गूंज उठा।

इस तरह से हुए पदाभिषेक समारोह के कार्यक्रम 

सुधर्मा सभा में उपस्थित तेरापंथ के चतुर्विध धर्मसंघ के वर्तमान आचार्यश्री महाश्रमण के महामंत्रोच्चार के साथ 17वें पदाभिषेक समारोह का शुभारम्भ हुआ। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत नित्य की भांति साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। मुनि वृंद ने तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता के 17वें पट्टोत्सव समारोह के संदर्भ में आचार्य वंदना को प्रस्तुति दी। शासन गौरव साध्वी कल्पलता ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। बहिर्विहारी अग्रणी साध्वी समुदाय ने गीत को प्रस्तुति दी। मुनि विजयकुमार, साध्वी बसंतप्रभा, साध्वी कनकरेखा, साध्वी साधनाश्री, साध्वी विमलप्रभा, समणी नियोजिका मधुरप्रज्ञा, मुनि कमलकुमार, साध्वी संगीतश्री ने आचार्यश्री की अभिवंदना में अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी तिलकश्री, साध्वी शशिरेखा, साध्वी कुंथुश्री, साध्वी सूरजप्रभा आदि साध्वियों ने सामूहिक रूप में गीत को प्रस्तुति दी। समणी कुसुमप्रज्ञा, साध्वी कीर्तिलता, साध्वी संघप्रभा ने भी अपनी अभिव्यक्ति साध्वीवृंद के एक और समूह ने गीत का संगान किया। आचार्यश्री के संसारपक्षीय भ्राता सूरजकरण दूगड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुनि राजकुमार ने गीत का संगान किया। मुनिवृंद ने भी गीत का सामूहिक संगान किया। तेरापंथ धर्मसंघ की नवमी साध्वीप्रमुखा साध्वीश्री विश्रुतविभा ने अपने उद्बोधन में आचार्यश्री महाश्रमण की अभिवंदना में अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। मुख्यमुनिश्री महावीरकुमार ने भी अभिवंदना करते हुए गीत का भी संगान किया। आचार्यश्री ने साध्वीप्रमुखाजी, साध्वीवर्याजी व मुख्यमुनिश्री सहित चारित्रात्माओं व श्रावक-श्राविकाओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री ने पट्टोत्सव के अवसर पर साधु-साध्वियों को विगयवर्जन से मुक्ति की बक्सीस प्रदान की। तदुपरान्त आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने खड़े होकर संघगान किया।

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Author: kalamkala

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