कर्म फल को बिना भोगे उससे छुटकारा संभव नहीं- आचार्य महाश्रमण,
विकास महोत्सव के दिन दीक्षा समारोह आयोजित करने की आचार्य ने की घोषणा


लाडनूं (kalamkala.in)। यहां जैन विश्व भारती में विराजित अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्य महाश्रमण ने अपने नियमित प्रवचनों की श्रृंखला में सोमवार को ‘कर्म से छुटकारा कब?’ विषय पर कहा कि जैन दर्शन के अनेक सिद्धांतों में ‘आत्मवाद’ एक प्रमुख सिद्धांत है, जिसमें आत्मा को शाश्वत बताया गया है। आत्मा हमेशा से थी, वर्तमान में है और आगे भी रहेगी। प्रत्येक आत्मा असंख्य प्रदेशों का पिण्ड होती है। उसका एक भी प्रदेश अलग नहीं हो सकता और न ही एक कोई अन्य प्रदेश उससे जुड़ सकता है। आत्मा अछेद्य, अदाह्य है। कर्मवाद का सिद्धांत भी जैन दर्शन में देखने को मिलता है। आत्मवाद व कर्मवाद के योग से मानों नव तत्त्वों का निर्माण हुआ है। इनमें जीव और अजीव के अलावा जो सात तत्त्व हैं वे आत्मा व कर्म से जुड़े हुए हैं। जीव को शुभ रूप में फल देने वाला कर्म पुण्य हो जाता है। जीव को अशुभ रूप में फल देने वाला कर्म पाप हो जाते हैं। जीव में कर्मों के आगम का मार्ग आश्रव, कर्मों को रोकने की विधा संवर, कर्मों को झाड़ने अथवा काटने की विधा तपस्या आदि द्वारा निर्जरा हो जाता है और कर्मों से पूर्णतया छुटकारा मोक्ष हो जाता है। इस प्रकार से सात तत्त्व आत्मा और कर्म से आधारित बनते हैं। इसलिए कर्मवाद भी जैन दर्शन एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है। लोकवाद भी यहां मान्य है।
कठिनाई को अपने कर्मों का योग समझ कर शांति और समता बनाए रखें
आचार्य श्री महाश्रमण ने आगे कहा कि आठ कर्मों के आलोक में जीवन की व्याख्या की जा सकती है। किन कर्मों के उदय से अथवा कर्मों के विलय से व्यक्ति की पहचान की जा सकती है। कर्मों को बिना भोगे अथवा काटे बिना छुटकारा नहीं मिलता। इसलिए आदमी को अपने अच्छे कार्यों के द्वारा बुरे कर्मों से बचने तथा पूर्व बंधे हुए कर्मों को संवर और निर्जरा के माध्यम से तोड़ने का प्रयास करना चाहिए। किए हुए कर्मों को भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता है। इसलिए आदमी के जीवन में कोई भी कठिनाई आए तो उसे अपने कर्मों का योग समझकर शांति और समता से सहन करने का प्रयास करना चाहिए और अपने चित्त समाधि को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को समाहित करने का क्रम भी जारी रखा।
20 सितम्बर को होगा दीक्षा समारोह
आचार्यश्री के समक्ष मुमुक्षु बाबूलाल बाफना व मुमुक्षु सुमन बाई ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।आचार्यश्री ने दोनों की प्रार्थना पर भाद्रव शुक्ला नवमी (विकास महोत्सव), 20 सितम्बर 2026 को आयोजित दीक्षा समारोह में साधु व साध्वी दीक्षा प्रदान करने की घोषणा की।कार्यक्रम के प्रारम्भ में आचार्य श्री महाश्रमण ने मंत्रोच्चार किया। साध्वीवृंद ने प्रज्ञागीत का संगान किया।





