कलम कला खास रिपोर्ट: चुनावी सालः क्या करें लाडनूं के लाल- इस बार दोवदार पार्टियों को नहीं उलझा पाएंगे जातिगत आंकड़ों के जाल में, अपनी जातियों के आंकड़े बढा-चढा कर देने की प्रवृति पर लगेगी रोक, पार्टी के समक्ष आईने की तरह रहेगी वास्तविक स्थिति 

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कलम कला खास रिपोर्ट:

चुनावी सालः क्या करें लाडनूं के लाल-

इस बार दोवदार पार्टियों को नहीं उलझा पाएंगे जातिगत आंकड़ों के जाल में,

अपनी जातियों के आंकड़े बढा-चढा कर देने की प्रवृति पर लगेगी रोक, पार्टी के समक्ष आईने की तरह रहेगी वास्तविक स्थिति 

(वरिष्ठ पत्रकार जगदीश यायावर की रिपोर्ट)
लाडनूं। विधानसभा चुनावों की आहट आने लगी है। सभी राजनीतिक पार्टियों और नेताओें की सक्रियता बेहद बढने लगी है। हालांकि अभी तक चारों तरफ दावेदारों द्वारा अपने दांव चलाए जा रहे हैं, ताकि उन्हें येन-केन-प्रकारेण टिकट मिल सके। प्रत्येक चुनाव से पूर्व यह कवायद तो होती ही है। किसी एक को टिकट मिलने के बाद अन्य दावेदारों को मनाने का दौर चलता है। पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी घोषित होने के बाद चुपचाप रातोंरात निराश दावेदारों से मुलाकात करने का दौर शुरू होता है और हर एक को उनकी बातें सुन कर अलग-अलग तरह से संतुष्ट करने और साथ लेने के प्रयास किए जाते हैं। आपको यहां लाडनूं विधानसभा सीट के बारे में बताने जा रहे हैं। यहां लम्बे समय से अनेक लोगों ने लाडनूं क्षेत्र से राजनैतिक आसमान पर चढने की कोशिश की, परन्तु उसमें सफलता इनेगिने लोगों को ही मिली है। शेष को अधिकृत प्रत्याशी ने सदा के लिए किसी न किसी प्रकार धूमिल करने के षड्यंत्रों का शिकार ही बनाया है। इस कारण यहां से अनेक दावेदार शांत होकर बैठ गए। इस बारे में विस्तार से कभी फिर करेंगे बात, अभी तो प्रस्तुत है यहां की स्थिति पर एक आकलन-

आओ जाने लाडनूं का इतिहास

नागोर जिले का लाडनूं पांच हजार साल पुराना शहर बताया जाता है, जो चंदेरी नगरी, बूढी चंदेरी, खड़ताबास, सहजावतों का बास आदि नामों से बसता-उजड़ता रहा और अंत लाडनूं के नाम से सुस्थापित हुआ। यहां की भूमि में आज भी प्राचीन मकानात, मंदिर, मूर्तियां, बत्रन, सिक्के, उपकरण आदि मिलते रहते हैं। हालांकि यहां से शिल्पकला की धरोहर ओर ऐतिहासिक विरासत को खुर्दबुर्द करने और तस्करों के हाथों पुरानी मूर्तियों, झरोखों, आदि को सलटा देने का सिलसिला लम्बे समय से चलता रहा है। लाडनूं कभी मोहिल वाटी और द्रोणपुर के अन्तर्गत रहा था। यहां मोहिलों के शासन और उसके बाद जोधा राठौड़ों के शासन का इतिहास उपलब्ध है। जोधपुर रियासत की जागीर के रूप में यहां जोधाओं के वंश के अंतिम शासक बालसिंह के पश्चात आजादी के बाद भी उनके वंशज ठाकुर के रूप में मनोहर सिंह माने जाते हैं, जो तीन बार लाडनूं से विधायक रह चुके हैं। उन्होंने एक बार निर्दलीय और दो बार भाजपा से विधायक सीट हासिल की थी। उनके पिता ठाकुर बालसिंह नगर पालिका लाडनूं के प्रथम अध्यक्ष रहे थे। लाडनूं में विधायक के रूप में सबसे अधिक बार हरजीराम बुरड़क 6 बार विधायक चुने जाते रहे हैं। हालांकि वे कभी एक पार्टी से बंध कर नहीं रहे। 1967 में उन्होंने पहली बार स्वतंत्र पार्टी में लोकसभा प्रत्याशी नन्दकिशोर सोमानी के साथ चुनाव लड़ कर जीत हासिल की थी। इसके बाद वे 1977 में जनता पार्टी, फिर जनता दल, लोकदल, दलित मजदूर किसान पार्टी (दमकिपा), कांग्रेस, निर्दलीय आदि रूप में चुनाव लड़ा था। क्षेत्र में एक बार कांग्रेस से शुकदेव शर्मा दीपंकर भी विधायक रह चुके। 1980 में निर्दलीय रामधन सारण भी विधायक रहे थे। वर्तमान में कांग्रेस से मुकेश भाकर विधायक है। यहां से समय-समय पर कांग्रेस व भाजपा के अलावा स्वतंत्र पार्टी, दमकिपा, जनता दल, बसपा, माकपा आदि दलों ने भी किस्मत आजमाई थी।

जातिगत आंकड़ों से आकलन, किसके कितने मतदाता?

नागौर लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले 10 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे छोर पर स्थित है लाडनूं विधानसभा क्षेत्र। एक अनुमान के अनुसार यहां की जनता में 19.02 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग हैं और मात्र 0.14 फीसदी अनु. जनजाति वर्ग के लोग है। अन्य निवासियों में मूल ओबीसी में सैनी, प्रजापत, जांगिड़, स्वामी, नाई, सुनार, रावणा राजपूत, गुर्जर आदि जातियों का बाहुल्य है। इनके बाद जाट, मुस्लिम, ब्राह्मण, राजपूत आदि आते हैं। बहुतायत में मूल ओबीसी, जाट, मुस्लिम व अनुसूचित जातियों के मतदाता यहां पर हैं। लगभग प्रत्येक राजनैतिक पार्टी इन जाति, वर्ग गत जनसंख्या व मतदाताओं की संख्या को देख कर ही टिकट देती है। यहां से टिकट के लिए दावेदारी प्रस्तुत करने वाले लोग अपने-अपने बायोडाटा में अपनी जाति की संख्या को बहुत अधिक बढा-चढा कर बताते आए हैं। राजपूत दावेदार राजपूतों के साथ मूल ओबीसी की जातियों रावणा राजपूत और चारण समाज को भी जोड़ कर आंकड़ा रखते हैं और उसमें में मनमाने ढंग से वृद्धि दर्शा देते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मण जाति का दावेदार अपनी जातिगत मतदाताओं की गणना में खंडेलवाल, पारीक, दाधीच, गौड, सेवक आदि सभी ब्राह्मणों की अलग-अलग जातियों को साथ में लेने के अलावा मूल ओबीसी के स्वामी, भार्गव आदि की संख्या को भी जोड़ लेते हैं। इस प्रकार लगभग सभी दावेदार झूठ का सहारा लेते हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत कोई भी आंकड़ा विश्वसनीय नहीं होता है। इस हालत में लगभग सभी पार्टियां सर्वे करने वाली टीमों एवं अन्य सोर्सेज का सहारा लेकर विधानसभा क्षेत्र के जातिगत आंकड़े हासिल करने लगी हैं। हाल ही में भारतीय जनता पार्टी ने नया रास्ता निकाला है, जो शुद्व आंकड़े देने में सक्षम है। इसमें पार्टी ने मतदाता सूचियों के प्रत्येक पृष्ठ को आगे-पीछे से एक पन्ना मान कर बूथ इकाई के नीचे नई ईकाई पन्ना प्रमुखों की बनाई है। पार्टी ने प्रत्येक पन्ना प्रमुख को अपने-अपने पन्ने में अंकित मतदाताओं के नामों की जातियों का उल्लेख करके जातिगत संख्या प्रत्येक पन्नावार उपलब्ध करवाने के निर्देश दे रखे हैं। इससे जो आंकड़े आएंगे, उन्हें मंडल स्तर पर एकजाई किया जाकर संगठन को भेजा जाएगा। यह जातिगत आंकड़ों की सही संख्या प्राप्त करने की वाजिब विधि है। इससे पार्टी को दावेदारों की पोल को ओपन करने में आसानी रहेगी।
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Author: kalamkala

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