सत्संग से होता है मानव जीवन खुशहाल- पं. रामपाल शर्मा शास्त्री जैसलाण, धोलिया ग्राम में भागवत कथा में गौसेवा के लिए उमड़ रहे हैं लोग

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सत्संग से होता है मानव जीवन खुशहाल- पं. रामपाल शर्मा शास्त्री जैसलाण,

धोलिया ग्राम में भागवत कथा में गौसेवा के लिए उमड़ रहे हैं लोग

लाडनूं (kalamkala.in)। कथा वाचक व्यास पं. रामपाल शर्मा शास्त्री ‘जैसलान’ ने कहा है कि भागवत के चार शब्द भक्ति, ज्ञान, वैराग्य व त्याग के प्रतीक है। पांच तत्वों से बने हुए इस प्राकृतिक जड़ शरीर को चेतन आत्म-तत्व से भागवत मिला देती है। मूल रूप से परमात्मा द्वारा चार श्लोकों में कही हुई भागवत का अठारह हजार श्लोकों में वेदव्यासजी ने विस्तार किया है, ताकि आमजन सरलता से व्यावहारिक जीवन जीने की कला सीख सके। वे यहां ग्राम धोलिया में स्थित श्रीगोपाल गौशाला में गौ सेवार्थ आयोजित भागवत कथा के दूसरे दिन कथा के दौरान सम्बोधित कर रहे थे। प़. शर्मा ने कहा कि सत्संग से मानव जीवन खुशहाल हो जाता है। इसी तरह कुसंग जीवन बर्बादी के रास्ते पर चला जाता है। सत्संग के लिए ब्रह्मलोक से चलकर सनकादि ऋषि बद्रीनाथ आये थे, इसका एक अर्थ यह भी है कि सत्संग धरती पर ही उपलब्ध है, ब्रह्म लोक में भी नहीं मिलता। मुक्ति मरणोपरांत नहीं बल्कि जीवित रहते हुए जीवन-मुक्ति है। भागवत सकाम शुभ कर्म से प्राप्त होने वाले स्वर्ग की बात नहीं करती, बल्कि फल की इच्छा व संसार की आसक्ति से रहित निष्काम कर्म की बात करती है, ताकि मानव मात्र जीते-जी मुक्त हो सके। उन्होंने बताया कि सबसे पहली भागवत-कथा श्रीशुकदेवजी ने श्रापित राजा परीक्षित को सुनायी थी। मन लगाकर कथा सुनने से सात दिनों में ही वे ब्रह्म-लीन हो गये थे।

अपने स्वरूप को पहचानें

पं. शास्त्री ने प्रसंगान्तर्गत आत्मदेव की कथा का वर्णन करते हुए बताया कि हम सभी आत्मदेव हैं, अतः हमें अपने स्वरूप यानी अपने आपको पहचानने की आवश्यकता है, हम सभी स्वयं को भूले बैठे हैं।
परमात्मा में दृढ़ भक्ति, अपने स्वरूप का ज्ञान तथा सत्कर्म करना ही मानव जीवन का पहला व आखिरी लक्ष्य है। पं. शास्त्री द्वारा बताया गया कि सनातन शास्त्र तथा भगवान की कथा का उद्देश्य स्वयं के साथ मानव मात्र का उद्धार है। शौनकादि ऋषियों द्वारा पूछे गए छ: प्रश्न इस कायाकल्प में रहते हुए सद्भावना पूर्वक जीवन जीने के तरीके से संबंधित है। वर्तमान आपाधापी के जमाने में व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ होता जा रहा है, अतः उद्वेलित व विचलित लोगों को सद्कर्म, भगवत्समर्पण व आत्मज्ञान के द्वारा अपने स्वभाव के अनुसार शुभ कर्म करने की सीख कथा से मिलती है। उन्होंने भागवत पुराण की रचना के उद्देश्य, श्री शुकदेवजी की जन्मकथा, अश्वत्थामा तिरस्कार व राजा परीक्षित को ऋषि पुत्र द्वारा दिए गए श्राप के प्रसंगों के साथ परमात्मा के सूक्ष्म व विराट रूप का वैज्ञानिक तरीके से वर्णन किया।

गौसेवा के लिए उमड़ रहे हैं श्रद्धालु

आरती के बाद सभी भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया। कथा में गांव धोलिया व आसपास के क्षेत्र के लोग गौसेवा हेतु आगे आ रहे हैं।

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Author: kalamkala

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