मनुष्य के भीतर छिपे गुण-अवगुण ही होते हैं दैवीय व आसुरी शक्तियां- संत अमृतराम महाराज,
लाडनूं के रामद्वारा सत्संग भवन में रामस्नेही संत का चातुर्मास सत्संग

लाडनूं (kalamkala.in)। स्थानीय रामद्वारा सत्संग भवन में चल रहे अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के संत अमृतराम महाराज ने अपने चातुर्मास सत्संग कार्यक्रम में बताया कि संसार में सद्गुण सम्पन्न एवं दुर्गुणशाली दो तरह के प्राणी पैदा होते हैं। इनमें सदगुणों वाले देवता कहलाते हैं और दुर्गुणों वाले राक्षस कहलाते है। देवता और राक्षस का कोई अलग चेहरा नहीं होता, वे हमारे अन्दर ही विद्यमान रहते हैं। अच्छी वृति या अच्छे विचार देवताओं के होते हैं और बुरे इन्सान के भीतर के बुरे विचार ही असुर होते हैं।उन्होने कहा कि मनुष्य जो अच्छा कार्य करता है, तो उसका तो वह उसका वर्णन करता है कि उसने यह अच्छा कार्य किया। और जो पाप वह करता है, उसे वह छुपा कर रखता है। इस कलियुग में इन्सान अच्छा तो कम करता है, लेकिन उसै जताता ज्यादा है। आदमी अपने गुणों की खुद स्तुति करे और दूसरे के दोषों का प्रचार करे, तो वह भी राक्षस ही है। दूसरों के दोष दर्शन करने से पहले व्यक्ति को अपने भीतर छिपे दोषों को देखना जरुरी है। हम एक अंगुली दूसरी तरफ उठाते हैं तो तीन अंगुली और अंगूठा खुद की तरफ हो जाता है। यानि सामने वाले से अधिक दोष हमारे स्वयं के भीतर होते हैं। संत अमृत राय महाराज ने बताया कि देवता भी हमारी पूजा तभी स्वीकार करते हैं, जब हम स्वयं गुणवान बनें। यहां रामद्वारा सत्संग भवन में चल रहे इस कथा-सत्संग में लाडनूं नगर के गणमान्य सज्जनों-महिलाओं सहित सैकड़ों श्रोता सत्संग का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।





