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क्यों तोड़ रहे हैं मुसलमान पाकिस्तान में मस्जिदें

क्यों तोड़ रहे हैं मुसलमान पाकिस्तान में मस्जिदें

(दिलीप ब्लाॅगर व अन्य की विशेष रिपोर्ट)
– पाकिस्तान के कराची के सदर इलाके की एक मस्जिद की मीनारों को तहरीक-ए-लब्बैक के कार्यकर्ताओं ने तोड़ डाला। साल 2022 में पाकिस्तान के गुजरावालां में भी एक मस्जिद को पाकिस्तान की पुलिस ने खड़े होकर तोड़वाया इसके अलावा पिछले महीने यानी दिसंबर में कराची में ही एक जमातखाने को तोड़ डाला गया था। पाकिस्तान में यह अहमदिया मुस्लिमों की मस्जिद में हमला था। जिसमें कराची में चरमपंथी समूह तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) के सदस्यों ने मस्जिद में तोड़फोड़ की। इससे पहले कराची में जमशेद रोड पर अहमदी जमात खाता की मीनारों को गिरा दिया गया था।
क्या पहली बार इस तरह के हमले हो रहे हैं?
पाकिस्तान में अहमदिया मुस्लिम और उसके धार्मिक स्थलों पर लगातार हमले होते रहे हैं। अहमदी मस्जिद पर ताजा हमला कराची के सदर में मोबाइल बाजार के पास हुआ। इसका वीडियो भी अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें चार नकाबपोश लोगों को मस्जिद पर चढ़ते और उसके बाद भागते हुए देखा जा सकता है।
पाकिस्तान में इस तरह के हमलों की लंबी फेहरिस्त है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में पिछले तीन महीनों में पांच अहमदी मस्जिदों पर हमला किया गया है। अगस्त 2022 में लाहौर से लगभग 150 किमी दूर फैसलाबाद में समुदाय से जुड़ी सोलह कब्रों को अज्ञात व्यक्तियों द्वारा तोड़ दिया गया था। 2017 के बाद से अलग-अलग कट्टरपंथी हमलों में 40 से अधिक अहमदी मारे गए हैं।
अब बड़ी बात ये है कि ये सारी मस्जिदें आखिर क्यों तोड़ी जा रही हैं? और हैरानी की बात ये है कि मस्जिदों को तोड़ने वाले भी मुसलमान ही हैं।
क्यों है आखिर यह नफरत


– दरअसल ये पाकिस्तान की अहमदिया मस्जिदें हैं, जिनको तोड़ा जा रहा है। दरअसल अहमदिया मुसलमान, इस्लाम के 72 फिरकों में से ही एक है, लेकिन मुसलमानों का सु्न्नी फिरका अहमदियों को मुसलमान मानता ही नहीं है, क्योंकि इस्लाम का ये सिद्धांत है मुहम्मद ही आखिरी पैगंबर है। लेकिन, अहमदिया मुसलमान मानते हैं कि मिर्जा गुलाम अहमद उनके पैगंबर हैं। अहमदिया मुहम्मद को पैगंबर तो मानता हैं, लेकिन आखिरी नहीं मानता है। बस यही वजह है कि सुन्नी मुसलमान अहमदियों से बहुत जबरदस्त नफरत करते हैं।
पंजाब में जन्मे थे ये पैगम्बर या मसीहा
– 1889 ईस्वी में मिर्जा गुलाम अहमद का जन्म पंजाब के गुरदासपुर के कादियानी इलाके में हुआ था। इन्होंने खुद को मसीहा घोषित करते हुए कहा कि मेरा इंतजार तो यहूदी और ईसाई भी कर रहे थे। इन्होंने खुद को मसीहा घोषित कर दिया और इनको मानने वाले ही अहमदिया मुसलमान कहलाए जाने लगे। जब पाकिस्तान बन रहा था तो अहमदिया मुसलमानों ने भी हिंदुओं की गर्दनें काटने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन अब कादियानी या अहमदिया मुसमलान पाकिस्तान में एक पीड़ित समुदाय के रूप में ही माना जाता है।
– मिर्जा गुलाम अहमद ने 1889 में इस्लाम के भीतर एक पुनरुत्थान आंदोलन के रूप में अहमदिया मुस्लिम समुदाय की स्थापना की थी। मिर्जा गुलाम अहमद का जन्म तत्कालीन ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था। अहमदिया मुस्लिम समुदाय की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक यह समुदाय समुदाय 200 से अधिक देशों में फैला हुआ है, जिसकी आबादी 1.2 करोड़ से अधिक है।
समुदाय में सबसे बड़ा स्थान खलीफा का होता है। संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद की मृत्यु के बाद से पांच खलीफाओं ने उनका स्थान लिया है। मौजूदा खलीफा मिर्जा मसरूर अहमद हैं, जो ब्रिटेन में रहते हैं और समुदाय के आध्यात्मिक और प्रशासनिक प्रमुख के रूप में कार्य करते हैं। जानकारी के मुताबिक, अहमदिया मुस्लिम समुदाय की दुनियाभर में 16,000 से अधिक मस्जिदें हैं। इस समुदाय ने कुरान का 70 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया है।
पाकिस्तान में समुदाय की स्थिति क्या है?
दुनिया में सबसे ज्यादा अहमदियों की संख्या पाकिस्तान में रहती है। समुदाय की आबादी देश की कुल आबादी का करीब 2.2 फीसदी है। इनकी संख्या 40 लाख के आसपास बताई जाती है। पंजाब प्रांत में रबवाह शहर अहमदिया समुदाय का वैश्विक मुख्यालय हुआ करता था लेकिन बाद में यह इंग्लैंड चला गया। पाकिस्तान दंड संहिता के अनुसार यह समुदाय मुस्लिम नहीं माना जाता है।
– 1974 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे जुल्फिकार अली भुट्टो ने एक कानून बनाकर अहमदिया को गैर मुसलमान करार दिया था। बाद में 1989 पाकिस्तान के सैनिक तनाशाह जिया उल हक ने ये नियम बनाया कि कोई भी अहमदिया खुद को ना तो मुसलमान कहेगा और ना ही वो अपने अकीदे का सार्वजनिक प्रदर्शन करेगा।
– पाकिस्तान में अहमदियों के खिलाफ अक्सर ईशनिंदा के मामले दर्ज किए जाते हैं, जिसकी सजा मृत्युदंड तक है। पिछले कुछ समय में कई अहमदियों पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया और उनकी हत्या तक कर दी गई। मई 2022 में एक ऐसी ही घटना में 33 वर्षीय अबुल सलाम की हत्या कर दी गई थी।
पाकिस्तान में कानून ही करता है भेदभाव
– 1974 में संशोधन विधेयक के पारित होने के बाद से, अहमदिया पाकिस्तान में आधिकारिक रूप से मुस्लिम नहीं हैं। अहमदी समुदाय यहां दूसरे दर्जे के नागरिकों के रूप में रहता है। प्यू रिसर्च पोल के अनुसार, केवल सात फीसदी पाकिस्तानी ही अहमदियों को मुसलमानों के रूप में स्वीकार करते हैं। इसके अलावा यहां उनके धर्म के प्रचार के अधिकार को कानूनी रूप से ही नकारा गया है। अल अरबिया पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 298-सी अहमदिया के खिलाफ भेदभाव को कानूनी दर्जा देती है। यह धारा अहमदियों को खुद को मुस्लिम कहने या अपने धर्म का प्रचार करने से रोकती है। यही कारण है कि अहमदी समुदाय अपनी सुरक्षा के लिए पाकिस्तानी कानून-व्यवस्था में तत्काल सुधार की मांग करता आया है।

किस मानसिकता में जी रहा है पाकिस्तान

– पाकिस्तान की हालत दिन पर दिन बदतर होती जा रही है लेकिन इसके बाद भी पाकिस्तान के अंदर जिहादी आंदोलन चल रहे हैं। तहरीके लब्बैक के लीडर साद रिजवी ने पाकिस्तान के लोगों से अपील की है कि तुम लोग भीख मत मांगो बल्कि एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में एटम बम का बॉक्स लेकर जाओ और ऐटमी हमले की धमकी दो तो देखो सारी दुनिया की नेमतें तुम्हारे कदमों में होंगी।
– ठीक इसी तरह साद रिजवी के पिता खादिम रिजवी ने भी कहा था कि कर्जा से मुक्ति पाने का फॉर्मूला यही है कि जो कर्जा मांगने आए, उसको जूते मारकर भगा दो। उसको गोरी मिसाइल और गजनबी मिसाइल दिखाओ…। इस तरह के सनकी मौलानाओं के पीछे पाकिस्तान की करोड़ों की जमात चल रही है।
kalamkala
Author: kalamkala

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