विधानसभा चुनाव-2023ः
लाडनूं से कौन होगा अगला भाजपा प्रत्याशी, दावेदारों की संख्या तेजी से बढने से रस्साकशी संभावित
चल रही है जोरशोर से अंदरखाने की तैयारियां, उच्च नेताओं से सम्पर्क बढाने व जनता का समर्थन जुटाने की कवायद शुरू
लाडनूं। राजस्थान में 7 दिसम्बर 2018 को विधानसभा चुनाव हुए थे। अब आगामी विधानसभा चुनाव 2023 में होने के आसार हैं। अभी तक यहां विधानसभा चुनावों को लेकर जनता मेें तो थोड़ी-बहुत चर्चाएं मात्र ही हैं, लेकिन राजनैतिक दलों में तगड़ी सुगबुगाहट और अंदरखाने तैयारियां व रस्साकशी जोरों पर चल रही है। पिछले चुनाव में भाजपा के तत्कालीन विधायक मनोहर सिंह कांग्रेस के मुकेश भाकर के सामने चुनाव हार गए थे। लगभग ऐसा होता आया है कि लाडनूं में विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की एक बार हार और एक बार जीत की स्थिति रहती आई है। इसे देखते हुए यहां भाजपा में उम्मीदवारों में अपनी-अपनी पेशकश की होड़ मची हुई है। पिछले चुनाव में भाजपा की हार के बाद इस बार जीत का निश्चित अनुमान लगाया जा रहा है। फिर लोग कांग्रेस से नाराज भी हैं। यहां राजपूत, जाट ही अधिकांशतः विधायक रहे हैं। अन्य जातियां अधिसंख्य होते हुए भी उन्हें दरकिनार किया जाता रहा है, उनका उपयोग केवल वोट के लिए किया जाता है। इससे त्रस्त अन्य जातियां भी आगामी चुनावों के लिए लामबंद होती नजर आ रही है। लाडनूं क्षेत्र से भाजपा की ओर से एक दर्जन से अधिक दावेदारों के नाम सामने आ रहे हैं।
भाजपा के लम्बी हुई दावेदारों की सूची
यहां भाजपा से विधायक बनने के लिए तैयार होने वालों की संख्या दिनोंदिन बढती ही जा रही है। अपने आपको दावेदार जताने वाले ये लोग आमजन से सम्पर्क जुटाने, तीज-त्यौंहारों में पहुंच कर लोगों से सम्पर्क करने, मृत्यु-मौखाण पर जाने, खेल प्रतियोगिताओं में चंदा देने और अपनी उपस्थिति मंच पर बैठने वालों के रूप में दर्ज करवाने के लिए अग्रसर रहते हैं, ताकि लोगबाग उनकी शक्लोसूरत से परीचित हो सकें। कोई उन्हें अन्जान प्रत्याशी और हवाई प्रत्याशी नहीं कह पाए। इसी तरह से जयपुर व दिल्ली के चक्कर लगाकर अपने आकाओं की तलाश करने और उन्हें भी चेहरा-दिखाई करके जाना-पहचाना बनने की फिराक चल रही है। भाजपा का कोई भी प्रमुख नेता नागौर जिले या चूरू जिला क्षेत्र और पास के सीकर जिले में भी आने पर वहां पहुंच कर हाजिरी देने की लालसा तेजी से बढती जा रही है। अब सबसे अहम बात यह मानी जा रही है कि पार्टी के उच्च नेताओं और टिकट का फैसला करने वाले नेतागण की नजर में कौन सबसे योग्य उम्मदवार हो सकता है। पार्टी जुआ नहीं खेलना चाहती तो सबसे जिताऊ और पार्टी में टिकाऊ दावेदार को ही अपनी उम्मीदवार निर्धारित करेंगे। इसीलिए अधिकांष दावेदार जयपुर-दिल्ली के चक्कर लगाकर सम्पर्क साध रहे हैं।
पूर्व विधायक के पुत्र लड़ेंगे इस बार चुनाव
भाजपा के तीन बार विधायक रह चुके ठाकुर मनोहरसिंह के स्वास्थ्य को देखते हुए उनके चुनाव नहीं लड़ने की संभावनाओं के मद्देनजर दावेदारों की तादाद बढ चली थी। इसी वजह से कुछ लोग पूर्व विधायक से नजदीकियां बढा कर अपनी पैठ मजबूत करने और चुनाव के दौरान उनकी साख को अपने पक्ष में भुनाने की चेष्टाएं कुछ लोगों द्वारा की गई, लेकिन अब उनके पुत्र कुंवर करणी सिंह के चुनाव मैदान में भाजपा के प्रत्याशी के रूप में उतरने की शंकाओं के चलते कुछ लोगों ने अपना रास्ता मोड़ भी लिया है, फिर भी काफी लोगों को उम्मीद है कि मनोहर सिंह के स्थान पर उनके परिवार से दूसरे को टिकट नहीं दिया जा सकता। इस कारण वे अब भी उनके माध्यम से स्वयं आगे बढने की सोच रहेे हैं। दूसरी तरफ भाजपा की टिकट के लिए पिछली बार दावेदार रहे जगदीश सिंह राठौड़ एडवाकेट भी इस बार दावेदारों की दौड़ में फिर शामिल हैं। उनका तरीका और राजनीतिक सोच सबसे अलग है। वे कुछ अलग ही जोड़-तोड़ करने में लगे हुए हैं। वे इस समय राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद भारत सरकार के सदस्य हैं और लाडनूं व नागौर जिले के साथ राजस्थान प्रदेश के कृषि व आर्थिक सुधार सम्बंधी हितों के लिए प्रयासरत एवं संघर्षरत हैं। वे भाजपा के सहकारिता प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक भी रह चुके हैं। सरपंच, पंचायत समिति सदस्य व उपप्रधान व कार्यवाहक प्रधान के रूप में रहकर वे अपनी राजनीतिक पकड़ को जनप्रतिनिधि के रूप में भी बनाए हुए हैं।
भाजपा के जिलाध्यक्ष हैं मजबूत दावेदार
इधर भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष गजेन्द्र सिंह ओड़ींट भी अपने आपको इस दौड़ में अग्रणी मान रहे हैं। उनका पद, उनका आरएसएस लाॅबी से होना, उनका सामाजिक स्तर, व्यापक जनसम्पर्क और लोगों से जुड़ा होने के कारण उन्हें ऐसा लगता है कि वे साफ छवि के हैं और उच्च पद पर भी हैं, इसलिए उनका टिकट तो पक्का ही है। इसमें उनके पीछे आरएसएस भी पूरी तैयार खड़ी मिलेगी और टिकट लेने में सहायक सिद्ध होगी। उनकी राजनीतिक-कार्यशैली आमतौर पर लोगों की सोच के अनुरूप स्वस्थ मानी जा रही है। भाजपा में प्रदेश स्तर पर भी उन्होंने अपनी पहुंच व पकड़ बनाई है और उच्च स्तर के अधिकांश नेतागण उनसे प्रभावित माने जा रहे हैं। इधर भाजपा केे जिला प्रवक्ता राजेन्द्र सिंह धोलिया को भी प्रमुख दावेदार माना जा रहा हैं। वे कुछ वर्षों से निरन्तर केवल पार्टी में ही नहीं बल्कि क्षेत्र के समस्त जाति-समाजों के साथ गहरे जुड़े हैं। वे वक्ता के रूप में भी अच्छे हैं और वर्कर के रूप में भी सक्रिय हैं। वे स्वयं सरपंच रहे हैं और उनकी पत्नी पंचायत समिति सदस्य भी हैं। उनकी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता एवं जनसामान्य तक पहुंच ने उनके पक्ष में एक टीम बना दी है, जो उनके लिए कार्य करने को तत्पर हैं।
जाट नेताओं में मचेगी भाजपा टिकट के लिए होड़
भाजपा किसान मोर्चा के जिलाध्यक्ष रह चुके देवाराम पटेल भी इस दौड़ में जाट प्रतिनिधि के रूप में शामिल हैं। वे पंचायत समिति सदस्य के रूप में जनसामान्य एवं क्षेत्र की समस्याओं को उठाने के लिए प्रशंसनीय रहे हैं। उन्होंने रताऊ क्षेत्र से पंचायत समिति सदस्य चुनाव में पूर्व कृषिमंत्री हरजीराम बुरड़क के पुत्र एवं प्रधान रह चुके जगन्नाथ बुरड़क को हरा चुके हैं। इधर पिछली बार रोलोपा से चुनाव उलड़ चुके जगन्नाथ बुरड़क के लिए भी लोगों के कयास हैं कि इस बार वे भारी समर्थकों के साथ अपनी भाजपा में हंगामेदार प्रविष्टी करेंगे और टिकट की दोवदारी जताएंगे। दूसरी तरफ भाजपा के जिला उपाध्यक्ष नाथूराम कालेरा का भी नाम जाट प्रत्याशी के रूप में लिया जा रहा है। वे एक संघर्षशील व्यक्ति हैं। उनकी पत्नी इस समय सरपंच है और पुत्री पंचायत समिति सदस्य। भाजपा के जिला महामंत्री रामाकिशन खीचड़ का भी डीडवाना के बजाए लाडनूं में प्रत्याशी के रूप में सफलता के चांस अधिक बनने के आसार हैं। वे भी प्रखर वक्ता और पार्टी के लिए पूर्ण समर्पित जबरदस्त कार्यकर्ता माने जाते हैं। जाट प्रत्याशियों के लिए दावेदारों के रूप में संयुक्त परिवहन आयुक्त डा. नानूराम चोयल का नाम भी जोरशोर से लिया जा रहा है। पिछले काफी वर्षों से वे अपनी राजकीय ड्यूटी के साथ गहरे राजनैतिक सम्पर्क बनाने में भी जुटें हैं। उनके सम्बंध केवल भाजपा ही नहीं बल्कि कांग्रेस, रालोपा आदि सभी दलों के प्रमुख नेताओं से हैं। इस बार उनका भारतीय जनता पार्टी से टिकट लेकर लाडनूं विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के आसार बने हुए हैं। दबे स्वरों में यहां कांग्रेस के प्रदेश सचिव रवि पटेल का नाम भी भाजपा के लिए दावेदारों में लिया जाने लगा है। इस सम्बंध में कुछ भी अभी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है। इतना जरूर है कि अगर वे भाजपा की सदस्यता लेते हैं, तो सब पर भारी पड़ेंगे।
ब्राह्मण और अनुसूचित जातियों से भी उभरेंगे दावेदार
ब्राह्मण समुदाय से जगदीश प्रसाद पारीक का नाम आ रहा है। उनकी पत्नी नगर पालिका में पार्षद हैं और उनकी पुत्रवधु नगर पालिका की अध्यक्ष रह चुकी है। वे स्वयं को प्रमुख दावेदार मान रहे हैं। ब्राह्मण समुदाय से ही भाजपा की जिला उपाध्यक्ष अंजना शर्मा भी भाजपा की ओर से दावेदारी पेश करेंगी। वे पंचायत और नगर पालिका चुनावों में अपनी भमिका निभा चुकी और जीत भी हासिल की थी। उनके पति वर्तमान में नगरपालिका मे ंपार्षद हैं। अनुसूचित जाति समुदाय से यहां पीडब्लूडी के उच्च अधिकारी एवं सार्वजनित निर्माण मंत्री युनूस खां के ओएसडी रह चुके निकटवर्ती बालसमंद गांव के निवासी बीएल भाटी भी प्रमुख दोवदार माने जाते हैं। हालांकि लाडनूं सीट आरक्षित वर्ग से नहीं है, इसके बावजूद क्षेत्र में अनुसूचित जाति के वाटों की संख्या बहुत ज्यादा होने और उनका जनसम्पर्क अन्य विभिन्न जातियों में गहराई से होने एवं उनकी लोकप्रियता भी होने से दावेदारी के प्रबल आसार है। निकटवर्ती सुजानगढ विधानसभा सीट आरक्षित होने से विभिन्न राजनीतिक लोग उन्हें सलाह देते हैं कि वे वहां से ट्राई करें, लेकिन लाडनूं उनका गृहक्षेत्र है और इस क्षेत्र के विकास के लिए उन्हें पीडब्लूडी से विशेष ध्यान देकर बहुत सारे कार्य करवाए, उनकी तारीफ आज भी लोग करते हैं। भाजपा के भी उनके समर्थकों की तादाद काफी है। वे इस समय भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और मेघवालसमाज के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। वे दिशा विजीलेंस समिति के सदस्य भी हैं। उनकी सामाजिक व राजनीतिक ताकत बहुत ज्यादा है और बहुत सारे उच्च नेता उनके सम्पर्क में होने से वे टिकट के लिए भारी पड़ सकते हैं। कहीं-कहीं दलित नेता कालूराम गेनाणा का नाम भी उछाले में आ रहा है। वे पंचायत समिति सदस्य रह चुके और वर्तमान में उनकी माता पंचायत समिति की उपप्रधान भी हैं। वे गतदिनों भाजपा के जिलाध्यक्ष गजेन्द्र सिंह ओड़ींट के साथ दिल्ली-जयपुर की यात्रा कर चुके और भाजपा के दिग्गज नेताओं से मुलाकात करके सम्पर्क बढा चुके हैं। इससे कयास लगाए जा रहे हैं कि उनकी मंशा कुछ और ही है।
खम ठोंक सकती है मूल ओबीसी भी
क्षेत्र मे सर्वाधित मत मूल ओबीसी जातियों के होने कें बावजूद उन्हें सदैव अपन राजनैतिक अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है, चारे पंचायत समिति के प्रधान का पद हो या नगर पालिका के चेयरमेन का पद अथवा विधायक की सीट, कहीं भी मूल ओबीसी को सामने नहीं आने दिया जाता है। इसलिए इस बार मूल ओबीसी के खम ठोंकने की स्थिति बनती जा रही है। मूल ओबीसी के लोग भाजपा के प्रति सर्वाधिक समर्पित रहते आए हैं। मूल ओबीसी के दावेदारों में उमेश पीपावत सबसे प्रमुख माने जा रहे हैं। उनका कद और पहुंच भी पार्टी में गहरी है। अपने पुरानेे सम्पर्कों का लाभ उठाने से वे चूकने वाले कत्तई नहीं हैं। वे भाजपा संगठन में मंडल अध्यक्ष ही नहीं जिला व प्रदेश में भी पदाधिकारी रह चुके हैं। वर्तमान में वे पार्टी में विधानसभा क्षेत्र के संयोजक का दायित्व निभा रहे हैं। उनके पार्टी के नए-पुराने सम्पर्क और उनकी राजनीतिक सूझबूझ उनके लिए जमीन तैयार कर रही है। मूल ओबीसी से ही महिला प्रत्याशी सुमित्रा आर्य का नाम भी कतिपय राजनीतिक हलकों में लिया जा रहा है। ज्ञातव्य है कि सुमित्रा आर्य भाजपा महिला मोर्चा की 4 बार जिलाध्यक्ष रह चुकी हैं, भाजपा की जिलामंत्री भी रही। वे राजस्थान राज्य समाज कल्याण बोर्ड की सदस्य भी सरकार की ओर से रह चुकी। सम्प्रति वे भाजपा महिला मोर्चा की वरिष्ठ जिला उपाध्यक्ष, भाजपा विशेष सम्पर्क प्रकोष्ठ की जिला सह संयोजक, भाजपा जिला कार्यकारिणी सदस्य के पदों पर कार्यरत हैं। वे अनेक बार नगर पालिका में भाजपा की पार्षद के रूप में रही है और वर्तमान में भी भाजपा की पार्षद हैं। वे भाजपा के प्रति समर्पण भाव रखते हुए दो बार चैयरमेन पद का त्याग पार्टीहित और पार्टी निर्णय के अनुसार कर चुकी। हाल ही में हुए नगर पालिका चुनाव में उन्होंने अध्यक्ष पद पर मात्र 23 वोट ही भाजपा के होने के बावजूद पार्टी के निर्देशार पार्टी की उम्मीदवार बन कर उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। वे नगर पालिका गंदी बस्ती सुधार समिति की चैयरमेन भी हर चुकी हैं। जिला परिषद में गठित जिला आयोजना समिति के चुनाव में उन्होंने जिले सर्वाधिक मत बटोर कर पार्टी की साख बनाई। जिला आयोजना समिति से उन्होंने लाडनूं शहर के लिए विकास का बजट भी पारित करवाया। जिला सतर्कता समिति में वे दो बार सदस्य रही और क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं का निराकरण करवाया। इनका भी सुदीर्घ राजनैतिक अनुभव है और 1981 से लगातार भाजपा की सदस्या के रूप में संगठन से जुड़ी रही हैं। इसके अलावा वे दुर्गावाहिनी में भी कार्य कर चुकी हैं। इन उपर वर्णित दावेदारों के अलावा अभी यह सूचि बहुत लम्बी है।
पार्टी में महिलाओं का कद बढने से बनेंगी दावेदार
भाजपा से टिकट के प्रमुख दावेदारों में राजपूत समाज के लोग सबसे ज्यादा हैं। इनके अलावा जाट, ब्राह्मण, ओबीसी और अनुसचित जाति के लोग भी चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। जातिगत समीकरण पूरे जिले के हिसाब से देखे जा रहे हैं। जिले से जातिगत संतुलन बैठा कर ही टिकट बांटे जाएंगे। किसी भी प्रमुख जातिवर्ग की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। जिले मेें कुल 10 विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें से मेड़ता व जायल ये 2 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। शेष 8 सीटों में से 4 जाटों को 2 राजपूतों को और शेष 2 सीटों को ब्राह्मण या ओबीसी केे बीच वितरित की जानी है। इन सभी सीटों में किसी भी जाति चाहे वह आरक्षित वर्ग हो, जाट, राजपूत, ब्राह्मण या ओबीसी हो, उनको दी जाएगी। इस कारण जिले के लगभग सभी क्षेत्रों से महिला दावेदार सभी राजनैतिक दलों में उभर कर सामने आई है। भाजपा में भी महिला दावेदारों की संख्या कम नहीं हैं। महिला नैत्रियों की बढती संख्या के कारण सभी राजनीतिक दल असमंजस में हैं। महिलाओं के कारण अनेक उम्मीदवारों को दरकिनार किया जा सकता है। भाजपा सहित कमोबेश सभी राजनीतिक दल व दावेदार इस स्थिति को भांप रहे हैं। पार्टियां यह भी महसूस कर रही हैं कि अगर महिलाओं की उपेक्षा की गई तो संभव है कि उनका वोटबैंक खिसक जाए।
