लाडनूं में आयुर्वेद अग्निकर्म चिकित्सा शिविर 2 जून को, सुप्रसिद्ध योगगुरू जयपाल द्वारा किया जाएगा दुःसाध्य रोगों का इलाज

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लाडनूं में आयुर्वेद अग्निकर्म चिकित्सा शिविर 2 जून को,

सुप्रसिद्ध योगगुरू जयपाल द्वारा किया जाएगा दुःसाध्य रोगों का इलाज

लाडनूं। आयुर्वेद की पांच हजार साल प्राचीन अग्निकर्म विधा से जटिल व दुःसाध्य रोगों के इलाज द्वारा उन रोगों से हमेशा के लिए निजात पाने की विधा को लेकर यहां कुम्हारों का बास में एक दिवसीय चिकित्सा शिविर आयोजित किया जा रहा है। यहां प्रजापति भवन में 2 जून शुक्रवार को प्रातः 9 बजे से सायं 5 बजे तक आयोज्य इस आयुर्वेद अग्निकर्म चिकित्सा शिविर में योगगुरू जयपाल प्रजापत (गिनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड धारक) द्वारा बिना दवाई इलाज किया जाएगा। शिविर में गठिया, जोड़ों का दर्द, घुटनों का दर्द, फ्रोजन सोल्डर, कमर दर्द, हाथ-पैर के आइटन आदि बीमारियों की चिकितसा की जाएगी।

क्या है अग्निकर्म चिकित्सा

भारतीय सर्जन महर्षि सुश्रुत, जिन्हें आधुनिक सर्जरी के जनक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने लगभग 2500 साल पहले सुश्रुत संहिता के प्राचीन आयुर्वेद साहित्य में अनेक चिकित्सा कर्मो एवं अनुशस्त्रों का प्रयोग बताया है, जिनमें क्षार कर्म, क्षार सूत्र, जलोका (लीच) कर्म, रक्तमोक्षण चिकित्सा के साथ ही अग्निकर्म चिकित्सा का वर्णन किया है। इस सदियों पुरानी प्राचीन चिकित्सा पद्धति में लौह, ताम्र, चांदी, वंग, कांस्य या मिश्रित धातु से बनी अग्नि शलाका से शरीर के दर्द वाले हिस्से पर विशेष उर्जा (गर्मी) देकर राहत दिलाने की तकनीक है। यह अग्निकर्म शरीर की विभिन्न मांसपेशियों और उनके विकारों को दूर करने के लिए उपयोगी है। इससे उपचार करने पर मरीज को कोई कष्ट महसूस नहीं होता। इससे उपचार करने में सामान्यतया एक बार में 2 से 5 मिनट ही लगते हैं और मरीज को तात्कालिक लाभ भी महसूस होता है। अगर मरीज आंखें बंद करके बैठा हो, तो उसे पता ही नहीं चलता कि अग्निकर्म से उसका उपचार भी हो चुका है। घुटने, कमर दर्द, एड़ी, मोच, सिर दर्द, कटिस्नायुशूल और गठिया जैसे रोगों के उपचार के लिए अग्निकर्म कारगर है। आधुनिक विज्ञान में इसकी तुलना थर्मल कॉटरी से की है। अग्निकर्म शरीर के विभिन्न मस्कुलोस्केलेटल और न्यूरोमस्कुलर विकारों में होने वाले दर्द को दूर करने के लिए उपयोगी है। इससे उपचार करने पर मरीज को कोई कष्ट या कॉम्प्लिकेशन महसूस नहीं होता।

अग्निकर्म चिकित्सा की विधि

अग्निकर्म प्रक्रिया में एक विशेष अग्निकर्म शलाका या सामग्री (जिनमें ठोस) द्रव, अर्धठोस, जानवरों से उत्पन्न एवं हर्बल प्रिपरेशन या मैटेलिक प्रोब उपकरणों का उपयोग किया जाता है। इसके रोग के उपचार में सामान्यत एक बार में 5 से 7 मिनट लगते हैं। अग्नि कर्म करने से पहले चिकित्सक के रोग के अनुसार रोगी की जांच कराई जाती हैं। रोगी को भली-भांति अग्निकर्म विधि की जानकारी दी जाती है। रोगी की सहमति प्राप्त कर अग्निकर्म किया जाता है। अग्निकर्म चिकित्सा का प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग करने से पहले पीड़ित व्यक्ति को पतला, पौष्टिक, चिकनाई युक्त आहार देते हंै। इसके बाद सबसे पहले रोगी के निदान और रोग की गंभीरता के आधार पर प्रभावित शरीर क्षेत्र पर विशिष्ट बिंदुओं की पहचान की जाती है। फिर, अग्निकर्म शलाका या चयनित दहन उपकरण को गर्म कर प्रभावित क्षेत्र पर सटीक रूप से लगाया जाता है और इसके बाद तत्काल राहत एवं शीतलता के लिए एलॉयविरा (ग्वारपाठा) के गुदे का उपयोग किया जाता है। रोगी को उसके प्रभावित स्थान पर मुलेठी चूर्ण लगाकर घर भेज दिया जाता है। उपचार के बाद रोगी अपनी दैनिक गतिविधियों को जारी रख सकते हैं।

अग्निकर्म और अन्य समतुल्य विधियां

आयुर्वेद की सुश्रुत संहिता में अग्निकर्म का विस्तृत वर्णन है। आजकल कुछ लोगो ने अग्निकर्म चिकित्सा को दाब देना, चटके लगाना, धमना देना आदि नामों से बदनाम किया है। बल्कि अग्निकर्म चिकित्सा का प्रयोग रोगों के निवारक,, उपचारात्मक, आपातकालीन के रूप में प्रयोग की जाती है। आधुनिक विज्ञान में सर्जरी की ओटी में अधिकांश शल्यकर्म (सर्जरी) अग्निकर्म उपकरण (कॉटरी) की सहायता से ही किए जाते हैं। जिनमे उतकों (टिशू) के छेदन (एक्सीजन), भेदन (इंसीजन) रक्त को रोकने के लिए (ब्लड कॉगुलेशन) के रूप में इसका प्रयोग किया जा रहा है।

किन रोगों में है अग्निकर्म चिकित्सा लाभदायक

– त्वचा, मांस, शिरा, स्नायु, संधि, अस्थि इनमें जहां तीव्र वेदना या रूजा अर्थात दर्द हो, उसमें अग्निकर्म से अधिक लाभ मिलता है।
– यह शरीर की विभिन्न मांसपेशियों एवं उनके विकारों को दूर करने के लिए उपयोगी है। वात से संबंधित परेशानियां जिनमें से सायटिका, फ्रोजन सोल्जर, कोहनी का दर्द, कटिशूल, संधि अस्थिगत वात, ऐड़ी में दर्द एप्लांटर फैसिटिस, त्वचा की एक्स्ट्रा ग्रोथ में अग्निकर्म किया जाता है।
– वात कफ दोष प्रधान आधिक्य विकारों में अग्नि के उष्ण, तीष्ण, रूक्ष गुण के कारण रोगों का शमन होता है।
– त्वचागत रोग, तिलकालक (काला तिल), चर्मकील, वाट्र्स, कदर या ठेठ, पैरों की कील, चिप्प, स्वेदज ग्रंथि, मशक (मस्सा), शरीर पर मस्सा, एक्स्ट्रा ग्रोथ, अर्श, भगंदर की शल्य क्रिया हेतु अग्निकर्म उपयोगी है।
– अधिक रक्तस्राव होने पर भी अग्निकर्म का प्रयोग किया जाता है।

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Author: kalamkala

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