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भारत में सैद्धांतिक ज्ञान के साथ क्रियात्मक शिक्षा देने की परम्परा रही है- प्रो. शास्त्री, ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा को बढ़ावा देने में शिक्षक की भूमिका’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित

भारत में सैद्धांतिक ज्ञान के साथ क्रियात्मक शिक्षा देने की परम्परा रही है- प्रो. शास्त्री,

‘भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा को बढ़ावा देने में शिक्षक की भूमिका’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित

लाडनूं। जैन विश्वभारती संस्थान के शिक्षा विभाग में आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा को बढ़ावा देने में शिक्षक की भूमिका’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे दिवस मुख्य वक्ता के रूप में विश्वविद्यालय के विशेषाधिकारी प्रो. नलिन के. शास्त्री ने कहा है कि भारत में गुरू का स्थान त्रिदेव से ऊपर दिया गया है और परमब्रह्म मान कर अर्चना की गई है। उन्होंने गुरू के महत्व को बताते हुए चाणक्य व चन्द्रगुप्त मौर्य, रामकृष्ण परमहंस व नरेन्द्र विवेकानन्द के उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने ऋग्वेद के 10वें सूक्त का मंत्र उल्लेखित करते हुए आंगिरस के विद्या सम्बंधी विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारत में सैद्धांतिक ज्ञान के साथ क्रियात्मक ज्ञान की शिक्षा देने की परम्परा रही है। वेदों में आचार्य को वाचस्पति, वसुपति, भूपत, ज्ञान निधि, मनुर्भव, वाक्तत्वविद, दूरदर्शी, प्रसन्नचित आदि गुणों से सम्पन्न होना आवश्यक माना है। उन्होंने शिक्षक के गुण बताते हुए कहा कि शिक्षक छात्र में स्वय को देखते हैं और परिवर्तन के पहरूआ होते हैं। शिक्षक अपने दृष्टिकोण से लचीला होता है, सामाजिक परिवेश के साथ समन्वय करते हैं। शिक्षक अच्छा परामर्शदाता होता है। शिक्षक मूल्यों का संचरण करता है, ताकि मूल्यनिष्ठ समाज का निर्माण हो सके। शिक्षक भविष्य का संरक्षक होता है, अज्ञान के अंधेरे को दूर करता है, आत्मविश्वास से लबरेज होता है, प्रोत्साहक होता है और छात्रों को कठोर अनुशासन के साथ उद्यम के लिएप्रेरित करता है। सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. बीएल जैन ने शिक्षा के स्वरूप को राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अनुरूप बनाने पर जोर दिया तथा कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में शिक्षा, शिक्षक, विद्यार्थी सभी को बेहतरीन नजरिए से देखा गया है। कार्यक्रम के अंत में सेमिनार प्रभारी डा. सरोज राय ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम में डा. आभा सिंह, प्रमोद ओला, अभिषेक शर्मा आदि सभी संकाय सदस्य एवं छात्राध्यापिकाओं के अलावा देश भर के अनेक विद्वान भी सम्मिलित हुए।
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Author: kalamkala

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