प्रदेश के श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी किया गया सम्मानित, लाडनूं के जैविभा विश्वविद्यालय के दूरस्थ व ऑनलाईन शिक्षा निदेशक एवं सुप्रसिद्ध लेखक, सुयोग्य शिक्षाविद् व समाजसेवी हैं प्रो. त्रिपाठी, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा जयपुर में आयोजित भव्य समारोह में हुआ सम्मान

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प्रदेश के श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी किया गया सम्मानित,

लाडनूं के जैविभा विश्वविद्यालय के दूरस्थ व ऑनलाईन शिक्षा निदेशक एवं सुप्रसिद्ध लेखक, सुयोग्य शिक्षाविद् व समाजसेवी हैं प्रो. त्रिपाठी,

राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा जयपुर में आयोजित भव्य समारोह में हुआ सम्मान

लाडनूं (kalamkala.in)। जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर के तत्वावधान में लाडनूं के जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के दूरस्थ एवं आॅनलाइन शिक्षा केन्द्र के निदेशक प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी को जयपुर में आयोजित एक सम्मान समारोह में श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में सम्मानित किया गया। शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित इस शिक्षक सम्मान समारोह 2025 की अध्यक्षता जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामसेवक दुबे ने की। समारोह के मुख्य अतिथि बगरू विधायक एवं पूर्व संसदीय सचिव डॉ. कैलाश वर्मा थे। विशिष्ट अतिथि राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अल्पना कटेजा रही। समारोह में जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलसचिव नरेन्द्र कुमार वर्मा, संयोजक शास्त्री कौशलेन्द्र दास, शैक्षणिक परिसर निदेशक डॉ. राजधर मिश्र, सह संयोजक डॉ. देवेन्द्र कुमार शर्मा, प्रो. महावीर प्रसाद सारस्वत बीकानेर, प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र दाधीच एसएमएस जयपुर, डॉ. दिवाकर मिश्र जयपुर, डॉ. प्रकाशचन्द मीना कोटखावदा चाकसू, डॉ. रामानन्द कुलदीपः, अजमेर, डॉ. सुभाषचन्द्र जयपुर और डॉ. पूनम गुप्ता थानागाजी अलवर आदि उपस्थित रहे।

चार दशकों से चली आ रही है शिक्षक की भूमिका

प्रदेश स्तर पर सम्मानित होने वाले श्रेष्ठ शिक्षकों में प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी सुदीर्घ काल से शिक्षा क्षेत्र से सम्बद्ध हैं। उनका 41 वर्षों का अध्यापन अनुभव रहा है। उनके निर्देशन में 32 स्कॉलर ने पीएचडी डिग्री प्राप्त की। वे वर्तमान में जैन विश्वभारती संस्थान मान्य विश्वविद्यालय लाडनूं में जैनविद्या तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष हैं तथा साथ ही दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। प्रो. त्रिपाठी प्रख्यात लेखक हैं। दर्शनशास्त्र के व्याख्याता होने के कारण दर्शन की प्रत्येक विधा पर उनकी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है, जिसका लाभ दर्शन के विद्यार्थी निरंतर प्राप्त कर रहे हैं। हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में उन्हें अपने विद्वतापूर्ण लेखन के लिए जाना जाता है।

अपार है प्रो. त्रिपाठी का रचना संसार

प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ‘रत्नेश’ की अब तक लगभग 65 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 7 कहानी संग्रह हैं, जिनमें ‘भाग्य चक्र’, ‘लहरों सा जीवन’, ‘रसगंधा’, ‘अनुत्तरित प्रश्न’, ‘अभिशप्त देवता’, ‘बढ़ते कदम बदलता देश’, ‘कुछ मत कहना’ प्रमुख हैं। नाटकों में कसम माटी की, उजाले की ओर,  युगांतर कर्मयोगी, यात्रा एक महा योगी की प्रसिद्ध है। 20 से अधिक बाल कहानी संग्रह प्रकाशित हैं, जिनमें  मीठे लाल की गठरी, भोंदूलाल की छतरी, अनूठा न्याय, मुनिया की समाधि, जंगल में 15 अगस्त, मां की सीख,  आसमान की सैर, सीमा रक्षा एवं डॉक्टर त्रिपाठी की बाल कहानियां आदि प्रसिद्ध हैं। अभिशप्त बेटी, डायरी के फैसले के बाद आदि उनके लघु कथा संग्रह हैं। वे विगत 30 वर्षों से वे निरन्तर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कर रहे हैं। उनकी लिखी हुई आदि शंकराचार्य पर स्क्रिप्ट का मंचन मध्य प्रदेश सरकार द्वारा किया जा चुका है। उनकी रचना ‘कसम माटी की’ नाटक का मंचन भी जवाहर कला केंद्र जयपुर में हो चुका है। नाटक ‘उजाले की ओर’ का मंचन भी कमानी थिएटर नई दिल्ली में हो चुका। आकाशवाणी नागौर पर उनकी 30 से अधिक कहानियां प्रसारित हो चुकी हैं। जयपुर दूरदर्शन पर उन्होंने कई परिचर्चाओं की संयोजना की है।

देश के ख्यातनाम सम्मानों से किया जा चुका है पुरस्कृत

प्रो. त्रिपाठी को देश के विभिन्न ख्यातनाम पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका। साहित्य जगत में की जा रही उनकी सेवाओं के लिए प्राफेसर त्रिपाठी को नवाजे गए पुरस्कारों में प्रमुख पुरस्कार हैं- अणुव्रत महासमिति का ‘राष्ट्रीय अणुव्रत लेखक पुरस्कार’, ‘राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी बाल साहित्य पुरस्कार’ चित्तौड़गढ़, नेपाल जैन परिषद सम्मान काठमांडू, राष्ट्रीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर, भवानीलाल गुप्ता कहानी पुरस्कार इलाहाबादए जवाहरलाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी, जयपुर द्वारा 2023 का ‘बाल साहित्य मनीषी सम्मान’ भी आदि महत्वपूर्ण हैं।
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Author: kalamkala

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